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Sunday, January 4, 2015

रेलवे स्टेशन पर एक लफंगे को सबक सिखाने वाली पत्रकार की डायरी

symbolic image
गहराती शाम के साथ ठंड बढ़ने लगी थी. हमारी ट्रेन करीब पांच घंटे लेट निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर पहुंची. 19 घंटे के थकाऊ सफर के बाद मैं और मेरा परिवार सामान लेकर नीचे उतरा. जितनी भीड़ प्लेटफॉर्म पर थी, उसे देखकर लग रहा था कि जैसे सब दिल्ली आने के लिए इसी ट्रेन से उतरे हैं.
हम लोग धीर-धीरे बाहर की ओर बढ़ने लगे. सामान ज्यादा था, इसलिए मैंने मां और मौसी को स्टेशन के बाहर सीढ़ियों के पास खड़ा कर दिया और एक-एक कर सामान लाकर रखने लगी. हमारे यहां रेलवे स्टेशनों पर सामान लेकर बाहर तक आना किसी जंग से कम नहीं है. मैं आखिरी बैग को अपने कंधों में लादकर बाहर आ ही रही थी कि एक शख्स मेरे बिल्कुल करीब से मुझे छूते हुए गुजरा. इतना ही नहीं, उसकी हिम्मत देखिए कि वह वह थोड़ा आगे बढ़कर पीछे मुड़ा और मुझे देखकर मुस्कुराने लगा.
मेरा दिमाग झन्ना गया और पल भर में ही तरह-तरह के ख्याल जेहन में आए. उसके चेहरे पर कामयाबी की मुस्कान मेरे दिल में चुभ रही थी. वक्त बहुत कम था. मैं फुर्ती से आगे बढ़ी और उसकी कलाई पकड़कर भीड़ से अलग फुटपाथ पर ले गई और उसके हाथ मरोड़कर पीछे से पकड़ लिया, ताकि वह भाग न सके. मैंने उसे एक जोरदार थप्पड़ दिया तो वह चौंक गया. मेरा मन अभी भरा नहीं था. मैंने अपनी पांचों उंगलियां मिला-मिलाकर उसके चेहरे पर पूरी ताकत से कई बार छापीं
. पता नहीं इतनी ताकत उसकी मुस्कान से पैदा हुई कुंठा से मेरे भीतर आई थी या इसके पीछे कोलकाता का पौष्टिक भोजन था. लेकिन मैं उसे अब भी बेतहाशा पीटे जा रही थी. मैं उसे घसीटकर बाहर टैक्सी स्टैंड की तरफ ले आई,  ताकि पुलिस वाला नजर आए तो उसके हवाले कर सकूं. लेकिन एक भी वर्दी वाला वहां नहीं दिखा.
अब आलम यूं था कि मैं पैदल चलते हुए पुलिस वाले को ढूंढ रही थी और साथ के साथ उस शोहदे को पीटे भी जा रही थी. कभी अपने हाथों से, कभी अपनी वॉटर बोटल से. उसके मुंह से कोई माफी नहीं निकली. बल्कि मार खाते हुए भी वह मेरा हाथ रोकते हुए बोला, 'पता है किसे मार रही है? झांसी से हूं मैं.' अब सुनना इतना था कि मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. मैंने पकड़ा उसका कॉलर और थप्पड़ लगा लगाकर उसका मुंह लाल कर दिया.
आप हैरान होंगे यह जानकर कि स्टेशन के बाहर पीठ पर बैग लिए जब मैं उसे पीट रही थी तो मेरे इर्द-गिर्द तमाशबीनों का एक घेरा बना हुआ था. वे अच्छी-खासी संख्या में थे, जैसे किसी फिल्म की शूटिंग देखने निकले हों. उस भीड़  में कॉलेज के छात्र थे, ऑटो-टैक्सी ड्राइवर थे और परिवार वाले लोग भी थे. मैं चिल्लाते हुए उनसे पुलिस को फोन करने को कह रही थी, लेकिन उस भीड़ में कोई भी ऐसा नहीं था, जिसने ऐसा किया.
अब क्लाइमेक्स भी सुन लीजिए. एक टैक्सी ड्राइवर भाईसाहब आए और बोले, 'छोड़ो न मैडम, बहुत मार लिया आपने इसे, जाने दो.' और उसने उस लफंगे को धक्का देते हुए तमाशबीनों के घेरे से बाहर निकाल दिया. कपड़े झाड़ता हुआ वह अपने रस्ते बढ़ गया. मैं अपना बैग और फोन चेक कर ही रही थी कि कुछ लड़कों की आवाज मेरे कान में पड़ी, 'भाई क्या कूटा है लड़की ने, कसम से मार-मार कर मुंह सूजा दिया.'