Sunday, January 29, 2012

राजा की तलाश...

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http://in.jagran.yahoo.com/news/travel/general/16_36_566.html

सरिसका जाने के लिए जयपुर से अलवर जब हमारी कार जा रही थी तो सबके मन में सिर्फ एक ही बात थी कि बाघ दिखेंगे या नहीं, इसके पहले जंगल सफारी नहीं की थी, चिडिय़ाघर तो देखे हैं लेकिन खुले बीहड़ जंगल में जानवर किस तरह घूमते फिरते हैं ये नजारा शहरों में रहकर देखने को कभी नहीं मिला। जैसे-जैसे सरिसका तक पहुंचने का रास्ता कम हो रहा था हम सब का उत्साह उतना ही बढ़ रहा था। सरिसका तक पहुंचने से पहले का रास्ता ही जंगल वाला हो गया था, बीच-बीच में हिरण, नील गाय नजर आती, जंगली सूअर भी मस्त होकर यहां वहां घूमते दिखे।

हम सब बस अब जल्दी से जल्दी सरिसका के अंदर पहुंचना चाहते थे। दोपहर के एक बजे की हमारी बुकिंग थी, पहुंचकर हमने अपनी ऑनलाइन एंट्र्री दिखाई और जीप ली। जीप मिलने के पहले तक लग रहा था कि शायद बंद जीप मिलेगी लेकिन महिंद्रा की खुली हुई जीप देखकर हम सबके चहरे खिल गए। सब जीप में सवार हुए और सरिसका के अंदर चले। हसरिसका के गेट से अंदर जीप जैसे ही घुसी लगा कि दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हैं। जंगल के रास्ते पर हमारी जीप बढऩे लगी और हम सब कैमरे इन नजारों को कैद करने लगे। बीच-बीच में ही ड्राइवर से एक ही सवाल कि बाघ कब दिखेगा? हमारी जीप जोन 3 की तरफ से जा रही थी। ड्राइवर ने बताया कि यहां तीन जोन हैं, इस जोन में वह जानबूझ कर लेकर आया है क्योंकि हो बाघ का लोकेशन इधर होने की बात थी। जैसे-जैसे घने जंगल की तरफ जीप बढ़ रही थी बाघ देखने की चाह और बढ़ रही थी। ऊपर से ड्राइवर के किस्से कि कभी तो बाघ फौरन दिख जाता है और कई बार दस बार जंगल सफारी करने पर भी बाघ के दर्शन नहीं हो पाते हैं। ड्राइवर ने बताया कि सरिसका में पांच बाघ हैं जिनमें से हाल ही में एक मर गया है। इन बाघों के नाम एसटी 1, 2, 3, 4, 5 हैं। उसने कहा कि सुबह से जंगल के किसी भी जोन में बाघ नहीं दिखा है तो हो सकता है आपको दिखे। ये बात सुनते ही हम सबके चेहरों पर रौनक आ गई। अचानक छोटे से पगडंडी नुमा चढ़ाई वाले रास्ते पर जीप चढ़ी , रास्ता एकदम खड़ा। फिर ड्र्राइवर ने हिदायत दी कि सब बैठ जाएं और हिले नहीं, अचानक जब ऊंचाई पर जाकर गाड़ी रूकी तो घाटियों का सुंदर नजारा देख सब मुग्ध हो गए। थोड़ी देर रूकने के बाद फिर उसी तेजी के साथ जीप नीचे उतरी, थोड़ी देर के लिए तो सबकी सांसे ही रूक गई थी। अब हम जंगल के बीच में पहुंच चुके थे। ड्राइवर ने अचानक कार रोकी और हमें नीचे जमीन की तरफ इशारा किया और बताया कि यहां से बाघ गुजरा होगा क्योंकि पैरों के निशान हैं फिर जीप को लेकर तेजी से घाटी के पास के रास्ते की ओर बढने लगा। इस बीच हमने खुले जंगल में खेलते, स्वतंत्र होकर घूमते जानवरों को देखा। वाकई में खुले जंगलों में जानवर अलग ही दिखते हैं और इन्हीं जानवरों के चेहरे चिडिय़ा घर एकदम मुरझाए नजर आते हैं। लेकिन जीप से उतर नहीं पाए, जीप से उतरकर फोटो खींचने की मनाही थी। ड्र्राइवर से मैने कौतुहल में पूछा कि कैसे बाघ के आस-पास होने का पता चलता है। इसपर ड्राइवर बोला कि इनकी लोकशन का अब अंदाजा रहता है और अगर बाघ आस-पास ही होता है तो दूसरे जानवर एक अजीब किस्म की आवाज निकालने लगते हैं। इन आवाजों से जानवर दूसरे जानवरों को बाघ के पास होने के बारे में आगाह करते हैं।
अब दिन धीरे-धीरे ढल रहा था और आधा जंगल घूम चुके थे लेकिन हमें कहीं बाघ नहीं दिखा। जंगल के बीच में एक छोटी सी जगह बनाई हुई है जहां जाकर अंदर सफारी करने वाले जीप जाकर रूकते हैं। जीप जैसे ही वहां खड़ी होती है चीं-चीं आवाज करती ढरों पक्षी आकर जीप में बैठ जाते हैं, इन्हें किसी से डर भी नहीं लग रहा था, कू द-कूद कर वह जीप के चारों तरफ खेलने लगी। तभी दो और जीप आकर वहां पर रूकी, उसमें बैठे लोगों के चेहरे बाघ न दिखने की निराशा बता रहे थे। लेकिन हमारे मन में जब भी उम्मीद थी कि शायद अब आगे चलकर हमें कोई बाघ दिख जाए। लेकिन तभी ड्राइवर ने आकर सूचना दी कि बाघ के लोकेशन आज जंगल की तरफ है ही नहीं, बाघ घाटी के पीछे की तरफ चले गए हैं। अब जीप दोबारा जंगल की ओर बढऩे लगी लेकिन कुछ घंटों के बाद हम सब सरिसका से बाहर निकलने वाले थे, सबके चेहरे अब मुरझा गए थे, मन में बस था कि एक बार बाघ दिख जाए, टाइगर रिसर्व में आए और बिना बाघ देखे निकलना बिल्कुल अ'छा नहीं लग रहा था। वापसी के रास्ते में अचानक कुछ तेज-तेज आवाजें आई, ड्राइव ने पूरी स्पीड के साथ जीप को घुमाया और एक बड़े से तालाब के पास जाकर रोक दिया, अचानक मन रोमांच से भर गया, लगा कि शायद बाघ जाने से पहले अपने दर्शन दे ही देगा लेकिन बहुत देर इंतजार करने पर भी निराशा ही मिली।

जानकारी
सरिसका टाइगर रिजर्व राजस्थान के अलवर जिले में पड़ता है। इसे 1955 में वन्य जीव संरक्षण घोषित किया गया और 1978 में इसे टाइगर रिजर्व का स्टेटस दिया गया। सरिसका का जंगल 866 स्क्वेयर किलोमीटर में फैला है। दिल्ली से ये 200 किलो की दूरी में है और जयपुर से 107 किमो है। बड़ी संख्या में लोग यहां घूमने आते हैं, विशेषतौर पर गर्मियों में ज्यादा आते हैं। यूं तो इन दिनों भी जाया जा सकता है लेकिन गर्मियों में बाघ दिखने की संभावना ज्यादा होती है। इस जंगल में बाघ, चीता, चितल, संभार, हिरण, चिंकारा, नील गाय, एंटीलोप, जंगली सूअर के साथ ही पक्षियों की कई प्रजातियां देखने को मिलेंगी। जंगल के अंदर बहुत सारे गांव भी बसे हैं और यहां एक मंदिर भी है। कई पर्यटक सिर्फ इस मंदिर को घूमने के लिए भी यहां आते हैं। यहां तक अपनी गाड़ी में अगर आया जाए तो बहुत अच्छा है। सरिसका तक पहुंचने से पहले रास्ते में बहुत सुंदर नजारे भी देखने को मिलेंगे। वहीं बीच में खाना खाने के लिए ढाबे भी नजर आएंगे, इन ढाबों पर एकदम देसी अंदाज में चारपाई में बैठाकर खाना परोसा जाएगा। बीच में मिडवे भी बने हैं जहां आप चाहें तो रूककर आराम कर सकते हैं।

कैसे करें बुकिंग 
यूं तो सरिसका में पहुंचकर भी वहां पर जीप या कैंटर बुक हो सकते हैं लेकिन छुट्टिïयों के दिनों में यहां बहुत भीड़ बढ़ जाती है, इसके लिए ऑनलाइन बुकिं ग सबसे उपयुक्त होती है। इसमें आप सीधा जाकर अपने मोबाइल में आए मैसेज को दिखाकर अपनी जीप ले सकते हैं। बुकिंग के समय बुकिंग चार्ज ले लिया जाता है और जीप के पैसे ड्र्राइवर को ही देना होता है। यहां सुबह सात बजे से शाम साढे सात बजे तक सफारी होती है। ऑनलाइन बुकिंग में आप अपने मुताबिक समय चुन सकते हैं। ऑनलाइन बुकिंग में सबसे जरूरी और ध्यान रखने वाली बात है कि आप अपना कोई आईडी जरूर लें जो बुकिंग में डाला है और वहां पहुंचने से पहले बुकिंग की डिटेल की कॉपी निकाल लें। जंगल सफारी का मजा जीप पर ज्यादा आएगा क्योंकि कैंटर बड़ा होने के कारण जुगल के खुले रास्तों पर ही चलता है लेकिन जीप आपको हर छोटे बड़े रास्ते पर ले जाएगी।

Tuesday, December 20, 2011

ब्रेक...ब्रेक


deepika n Ahmad sahab with Aloo chat 
कनॉट प्लेस से नोएडा का ऑफिस, लगता है जैसे किसी ने अचानक किसी जंगल में फेंक दिया हो। इस सेक्टर में न तो इंसान दिखते हैं न ही कोई चहल-पहल। छह महीने हो गए हैं इस ऑफिस में लेकिन मन ही नहीं लग रहा है। कनॉट प्लेस में मेट्रो और बस का सफर था तो यहां लदे हुए ऑटो का एक्साइटमेंट। यही नहीं ऑटो में बैठकर आप किसी से फोन पर बात नहीं कर सकते, ऑटो वालों के पसंदीदा गानों की आवाज ही इतनी होती है कि फोन काटने के अलावा कोई उपाय नहीं होता। अपने फोन के गानों के कलेक्शन को आखिरी बार कब सुना है याद ही नहीं है। ऊपर से घंटों जाम, अगर ऑटो वाले को धीरे चलाने बोलो तो कहेंगे 'क्या मैडम हमारी जान भी है तो है, कुछ नहीं होगा, आराम से बैठो।'
इस शनिवार जब मेरी छुट्टी थी तो मन किया फौरन कनाट प्लेस पहुंच जाऊं। दीपिका को फोन आया और मै दोपहर को चल पड़ी मेट्रो में सवार होकर कनॉट प्लेस, मेट्रो में अपने फोन के गानों को सुना, लेडीज कोच में बैठीं लड़कियों और आंटी की बातों की तरफ भी ध्यान गया। :) :)
किसी के पास दोस्तों की बातें तो कोई बॉय फ्रेंड को लेकर परेशान, किसी के पास बच्चों की आदतों की बातें तो किसी के पास पति की। आनंद विहार से राजीव चौक इन सब बातों में ही आ गया। दीपिका से बहुत दिन बाद मिली और मिलते ही हमारी शरारतें, बच्चों वाली हंसी, बे सिर-पैर की बातें, ढेर सारी गप्प, बॉयफ्रेंड की बुराई, कनाट प्लेस के गलियारों की सैर ,सेंट्रल पार्क में चल रहे यूथ फेस्टीवल का नजारा, वहां का आलू चाट, सड़क के किनारे की चाय और हमारी बकवास....
इन सब में दोपहर से रात कैसे हुई पता ही नहीं चला। बहुत दिन बाद नोएडा वाले रूटीन से अलग नॉर्मल जिंदगी और इस तरह एक छुट्टी से मै फिर से पूरे हफ्ते नोएडा जाने के लिए तैयार हो गई। ऊफ !!! कभी-कभी ब्रेक कितना जरूरी होता है ना।


Friday, December 16, 2011

उफ !!! कैसी-कैसी आवाज


हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में न जाने कितनी ही तरह की आवाज हमारे कानों में आती है। यही आवाज हमारी जिंदगी का भी हिस्सा बन जाती है। रोज सुनाई देने वाली आजाव एक दिन न आए तो कुछ खलीपन लगता है और रोज जब यही आवाज सुनाई देती है तो कभी-कभी झुंझलाहट भी आती है। मेरी तो पहचान इतनी तरह की आवाजों से हो गई है कि अब दूसरे शहर में जाने से उन आवाजों की कमी सी लगने लगती है। अगर बहुत सुबह अपने आप आंख खुलती है तो कभी पहली अजान की आवाज आती है फिर नींद लग जाती है तो घर के पीछे मंदिर की आवाज।
यही नहीं पड़ोस वाले चौहान अंकल की भक्ति भावना तो ऐसे फूटती है कि सुबह 6 बजे इतनी तेज आवाज में भक्ति संगीत लगते हैं कि खिड़की-दरवाजे चीरती हुई आवाज कानों में आती है। फिर मीठी नींद लगने को होती है तो सात बजे से मम्मी की आवाज। क्योंकि मॉनिंग वॉक बंद है इसलिए कुछ दिन से चिडिय़ा और आपस में खेलते जानवारों की आवाज नहीं सुन पा रही हूं। नींद खुलने बाद से ही मम्मी की शिकायतें, पापा का न्यूज या स्पोटर्स चैनल की आवाज। तैयार होते-होते नीचे वाले फ्लैट की आंटी की आवाज जो झाड् लगाते हुए पूरे मोहल्ले से बात कर लेती है।
तैयार होकर कॉलोनी से बाहर बस स्टॉप तक आओ तो गाडिय़ों की चिल-पौं, इस पर गला फाड़-फाड़ कर ग्रामीण सेवा ऑटो से आवाज ...आनंद विहार...आनंद विहार...फिर नोएडा के लिए ऑटो ढूंढना नहीं पड़ता हाइवे के कोने में पहुंचते ही शेयरिंग ऑटो वालों की बासठ-बासठ-खोड़ा-कला पत्थर.....ऑटो में बैठते ही ऑटो वालों के सुपरफेमस गानों -तुम तो ठहरे परदेसी....साथ क्या निभाओगे की आवाज....फिर रिक्शा की घंटी की आवाज, ऑफिस में आकर काम शुरू करते ही की-बोर्ड की खटखट आवाज ऑफिस में किस्म -किस्म के लोगों की आवाज, बीच में बीच में बजते मोबाइल फोन की आवाज तो ऑफिस और घर के लैंडफोन की आवाज। यही करते हुए घर वापस। इन आवाजों के बिना तो एक दिन भी सोचना मुश्किल है। आवाज आवाज और आवाज ...

Monday, December 12, 2011

Happy Bday Dilli


Love You Dilli 

आज दिल्ली 100 साल की हो गई है। सभी न्यूज चैनल और अखबार दिल्ली के इतिहास को अपने-अपने तरीके से सामने ला रहे हैं लेकिन मुझे लगता है दिल्ली हर एक के लिए अपने नजरिए से खास है। कोई और शहर में ये बात ही नहीं है जो दिल्ली में है। किसी और शहर में जाने के बाद कुछ दिन तो बहुत अच्छे लगते हैं पर फिर लगता है कि अपनी दिल्ली ही सबसे अच्छी है। यहां केस्ट्रीट फूड से लेकर शॉपिंग, दोस्तों के साथ बैठकर गपशप के अड्डों से मेट्रो का खूबसूरत सफर, दिल्ली की यही बातें इसे दूसरे शहरों से अलग बनाती है और बाहर से आकर भी लोग इस शहर को अपना बना लेते हैं। घंटों बाराखंबा रोड के ऑक्सफोर्ड बुक शॉप में बैठकर किताबों में डूबना हो या फिर दोस्तों के साथ कनॉट प्लेस की गलियारों में तफरी करनी हो, कॉफी होम में बैठकर नूडल्स खाने हो या फिर खादी भंडार में शॉपिंग करनी हो दिल्ली की ये बात किसी और शहर में शायद ही मिले। यही नहीं किसी भी धर्म का त्योहार ही क्यों न हो दिल्ली पूरी तरह से उसके रंग में रंगी होती है। एक नजर में क्यों है दिल्ली मेरे लिए खास --
1. मेरी कॉलोनी जहां पूरा बचपन बीता
2. महाराजा अग्रसेन कॉलेज और कॉलेज के पास बना पार्क, आचार्यनिकेतन मार्केट, कॉलेज का बस स्टॉप
3. दिल्ली की बसें और अब मेट्रो
4. यूनिवर्सिटी एरिया, टॉम अंकल की मैगी
5. कमला नगर, सरोजिनी नगर, लाजपत नगर, लक्ष्मी नगर के बाजार जहां सीमित बजट में सब कुछ मिल जएगा
6. वी3एस मॉल के फूड कोर्ट में मेरा फेवरेट पास्ता कॉर्नर
7. लक्ष्मी नगर में ही मेरी फेवरेट फिंगलीशियस केक शॉप
8. शकरपुर का कचौड़ी वाला
9. मंडी हाउस और वहां के थिएटर
10. कनॉट प्लेस के गलियारे, ब्रांडेड शॉपिंग के लिए शोरूम
11. हनुमान मंदिर की कचौडिय़ां और वहां लगने वाली मेंहदी
12. जनपथ की स्ट्रीट शॉपिंग
13. गोल मार्केट और वहां के फूड ज्वाइंट्स
14. दिल्ली के हर कोने में मिलने वाला स्ट्रीट फूड
15. निजामुद्दीन का चिकन वाला, करीम का खाना
16. पुरानी दिल्ली की रौनक, वहां की हर गली में मिलने वाला स्ट्रीट फूड, पुराने जलेब की दुकान, और खासतौर पर पुरानी दिल्ली का करीम
17. न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में शोरमा की दुकान
18. इंडिया गेट में शाम की वॉक
19. निजामुद्दीन की दरगाह 
20. सफदरजंग मकबरे में दोस्तों के संग मस्ती
21. साल में एक बार लगने वाला ट्रेड फेयर
22. बचपन में मम्मी-डैडी के साथ अप्पूघर की मौज-मस्ती
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    लिस्ट बहुत लंबी है और उसे लिखते लिखते दिल्ली का दूसरा जन्मदिन आ जाएगा। 



Friday, December 9, 2011

Few Questions and answer = Mahua

Hi guys i am new to blog world, so starting with a small introduction..... here is few questions which describe mahua....


LAST TIME :
last hangout : last tuesday 6 dec..dilli's street food n dinner @ Karim's Purani dilli
last phone call : just half an hour ago to a most misterious person in this world.
Last time you cried : last night (8 dec 2011)

HAVE YOU EVER : 
Been depressed : Yes
Lost someone special : Yes :) *blush*blush*
Been drunk : yes with my gang 


MY COLOURS : 
Yellow
white
green-- someone's favourite now my favourite too
blue
infact all colours xcpt BLACK..my world is so colourful


LOVE TO :
smile
shop
write
winters-- specially delhi's winter
dance in rain


IDEA of PERFECT DATE
a cup of tea/coffee in peacful place.


ABOUT LOVE LIFE 
Oops >>> its complicated :P :P



BELIEVES IN
myself

God 
Angels


SOMETHINGS I JUST CRAZY FOR :
beautiful sunset
sunrise
night in terrace with a someone special
anytime Strawberry crush icecream :) :)


RIGHT NOW :
@ my desk
Eating : roasted peanuts
litenting to Zee news