
जेहन में एक ही ख्याल आ रहा था बच्चों का बचपन कार्टून और खेल से इतर पढ़ाई, प्रतियोगिता, हॉबी क्लास तक रह गया है। क्या इन्हें हमारे बचपन की तरह रविवार का इंतजार नहीं होता होगा? क्या दिन हुआ करते थे बचपन के और क्या रविवार हुआ करता था। रविवार तो आज भी आता है लेकिन दीदी के मुंह से उनकी बेटी का रविवार सुनकर अचानक ही अपने बचपन के रविवार के दिन याद आने लगे। पूरे सप्ताह टीवी में आने वाला धारावाहिक श्रीकृष्ण, रामायण देखने का इंतजार होता था, कॉमेडी धारावाहिकों में देख भाई देख जैसे धारावाहिक हंसाते थे। सुबह रविवार का खास नाश्ता होता था, पापा के साथ बगीचे की सफाई होती थी, वो फूलों की जानकारी देते थे और हम उत्सुकता से वो बातें सुनते थे। यही नहीं आस पड़ोस के घर के आंगन में बच्चों के साथ विभिन्न खेलों में पूरा दिन निकलता था।
इस तरह खेलते हुए दिन चढ़ता और मां के बुलाने पर दोपहर का खाना होता लेकिन किसी तरह खाना खत्म करके फिर बाहर जाने की हलचल मन में होती थी। धूप में जाने की मनाही होने पर घर पर ही सबको बुलाकर एक कमरे में लूडो, कैरम खेला जाता था। यही नहीं पास की किताबों की दुकान से चंपक, नंदन, चाचा चौधरी कॉमिक्स लाकर छुट्टïी का एक दिन गुजर जाता था। शाम को फिर अपने साथ के बच्चों के साथ बाहर खेलने जाना, साइकिल चलाना और घर के बनाए एक नियम के मुताबिक स्ट्रीट लाइट जलने से पहले घर घुसने की बात दिमाग में रखना। वो बात हमेशा याद रहती कि स्ट्रीट लाइट जलने तक घर लौटना है, उससे देर हुई तो डांट पड़ती।
क्या खास होते थे वो रविवार, क्या खास होते थे वो दिन। आज के बच्चों का बचपन वक्त की गति के साथ तेज चल रहा है। बचपन के उन खेलों की जगह उनकी विभिन्न विषयों की ट्यूशन क्लास ने ले ली है, बाहर जाकर खेलने की बजाए वो घर पर अपने प्रोजेक्ट पूरे करते हैं। पढ़ाई और प्रतियोगिताओं का दबाव हमेशा उनके साथ चलता है। हर चीज में बेस्ट होने की कोशिश में शायद कुछ खो रहे हैं ये बच्चे। क्या आज के बच्चों को रविवार का इंतजार होता होगा? या फिर उन्हें रविवार के नाम पर अपनी मैथ्स क्लास या हॉबी क्लास का टाइमटेबल याद आता है और खेल के नाम पर कंप्यूटर के गेम...